आम तौर पर इस तरह की रिपोर्ट कोई भी टूर्नामेंट खत्म होने के बाद बनाई जाती है कि आयोजन के नजरिए से टूर्नामेंट कैसा रहा? मजे की बात ये है कि विश्व कप के आयोजन की चर्चा में तो विशेषज्ञों ने लगभग आधा टूर्नामेंट खेले जाने का भी इंतजार नहीं किया। इंग्लैंड से बाहर की रिपोर्टिंग तो छोड़िए – इंग्लैंड में भी नजरिया यही है कि इंग्लैंड में आयोजित पिछले सभी विश्व कप की तुलना में ये सबसे लचर, गलतियों, तमाशों और अजीब फैसलों वाला विश्व कप है – शायद इसीलिए बरसात भी इस पर कोई मेहरबानी नहीं कर रही।
तमाशा तो मैचों का सिलसिला शुरू होने से पहले ही शुरू हो गया था। मैच देखने इंग्लैंड आने वालेां को लगा ही नहीं कि यहां वह विश्व कप हो रहा है, जिसका पूरी क्रिकेट की दुनिया में शोर है – न सड़कों पर कोई बैनर, न बोर्ड, न अखबारों में विश्व की रिपोर्टिंग से भी। मैच वाले स्टेडियम के करीब जाओ, वह भी मैच वाले दिन, तो पता लगता है कि विश्व कप है।
जिन्होंने मैचों से कई महीने पहले ऑन लाइन टिकट बुक करा लिए – उन्हें मैच के दिन तक टिकट नहीं मिल पा रहे। टिकट बांटने के लिए जिम्मेदार एजेंसी घोटाला कर गई। यहां तक कि ट्रेंट ब्रिज में खेले गए पहले मैच में जिनके पास टिकट थे वे भी घटिया इंतजाम के कारण स्टेडियम में दाखिल नहीं हो पाए। ये ठीक है कि ऐसे हर व्यक्ति को आईसीसी ने टिकट के पूरे पैसे वापस दिए पर टिकट इसलिए तो नहीं खरीदा था कि पैसे वापस लेने हैं।
जिंग बेल्स ने मैचों का मजाक बना दिया है। क्रिकेट में जिंग बेल्स जैसा तमाशा आने से पहले, गेंद के स्टंप्स पर लगने के बावजूद बेल्स न गिरने की घटना को एक अजूबा गिना जाता था। इस बार तो हद ही हो गई। पहले 12 दिन में 5 बल्लेबाज साफ आउट थे पर बच गए – बेल्स अपनी जगह से हिलीं पर गिरी नहीं और अपनी जगह वापस! विश्व कप में प्रयोग हो रही जिंग बेल्स वही हैं जो कुछ दिन पहले आईपीएल में प्रयोग हुई थीं। वहीं से पता लग गया था कि कुछ तो गड़बड़ है तभी तो कई बार गेंद स्टंप्स पर लगने के बावजूद बेल्स नहीं गिर रहीं। तब भी आईसीसी ने इन बेल्स को सुधरवाने या तकनीकी कमी पता लगाने की कोई कोशिश नहीं की। अब वे कहते हैं कि टूर्नामेंट के बीच में कुछ नहीं किया जा सकता।
वास्तव में तो विश्व कप में टीम की गिनती कम हुई है – तब भी आईसीसी ने ग्रुप मैचों के लिए बरसात की हालत में कोई रिजर्व दिन नहीं रखा। तय दिन मैच नहीं हुआ तो छुट्टी। नतीजा ये है कि 14 जून तक मैच नंबर 19 में से 4 मैच बरसात की भेंट चढ़ चुके हैं। पिछले किसी भी विश्व कप में ऐसे मैच की गिनती 2 से ज्यादा नहीं थी और यहां तो 5 दिन के अंदर ब्रिस्टल के दोनों मैच बरसात में उड़ गए। पहला पाकिस्तान श्रीलंका और दूसरा बांग्लादेश-श्रीलंका मैच था। साउथंपटन में दक्षिण अफ्रीका-वेस्टइंडीज मैच शुरू होने के बाद बरसात ने रोका, जबकि ट्रेंट ब्रिज को भारत-न्यूजीलैंड मैच पसंद नहीं आया।
बांग्लादेश के कोच स्टीव रोड्स ने ठीक कहा – मैचों का प्रोग्राम ऐसा बनना चाहिए था कि दो मैच के बीच कम से कम 3-4 दिन का अंतर हो और उनमें से एक दिन रिजर्व रख सकते थे। आईसीसी ने इस बात की कोई चिंता नहीं की। सिर्फ सेमी फाइनल और फाइनल के रिजर्व दिन के साथ ही टूर्नामेंट में आगे बढ़ रहे हैं।
अगर आप विश्व कप से पहले की मौसम की भविष्यवाणी पढ़ें तो उनमें साफ लिखा है कि 2018 सीजन की तरह मौसम गर्म रहेगा। हो रहा है उलट, बरसात सारे रिकॉर्ड तोड़ रही है। इसी का असर पिच पर आया – कहीं तो 300 का स्कोर आसानी से पार हो रहा है तो कहीं 200 रन बनाना भी मुश्किल हो रहा है, जब एक ही टूर्नामेंट में पिच के मिजाज में इतना फर्क हो तो यह बराबरी का मुकाबला कहां रह जाता है?
स्पष्ट है इस बार आईसीसी की तरफ से ग्राउंड वर्क में कमजोरी रही और कीमत विश्व कप चुका रहा है।
