भारत के प्रसिद्ध वकील एवं राजनीतिज्ञ अरुण जेटली का पिछले दिनों 24 अगस्त 2019 को दिल्ली के एम्स में निधन हो गया। वे भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेता एवं पूर्व वित्त मंत्री थे। लंबे समय से मौत से जंग लड़ रहे जेटली जितनी राजनीति में पकड़ रखते थे, उतना ही उन्हें क्रिकेट से भी लगाव था। अपनी युवावस्था में वे क्रिकेट खेलना भी पसंद करते थे। उनका योगदान दिल्ली की क्रिकेट में भी खूब रहा।

अरुण जेटली ने लगभग 14 साल दिल्ली एंड डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट एसोसिएशन (डीडीसीए) के अध्यक्ष के तौर पर काम किया। वे 1990 के दशक में डीडीसीए के सदस्य बने थे। साल 1999 से लेकर 2013 तक जेटली ने डीडीसीए के अध्यक्ष के तौर पर काम किया। भारतीय क्रिकेट के कई दिग्गजों को जेटली ने आगे बढ़ने में मदद की और उनकी विश्व क्रिकेट में पहचान बनाने में अहम भूमिका निभाई। भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व ओपनर वीरेंद्र सहवाग को उनके समय में दुनिया के सबसे खतरनाक बल्लेबाजों में गिना गया। जेटली के कार्यकाल में ही दिल्ली से ना केवल सहवाग, बल्कि गौतम गंभीर, शिखर धवन, विराट कोहली जैसे धुरंधर बल्लेबाज भी निकलकर सामने आए। सहवाग और गंभीर ने लंबे वक्त तक टीम इंडिया की ओपनिंग की थी। जेटली खुद दिल्ली के उभरते हुए खिलाड़ियों की पैरवी बीसीसीआई में किया करते थे।

एक वक्त ऐसा भी था, जब सहवाग ने दिल्ली क्रिकेट टीम को छोड़ने का मन बना लिया था। सहवाग को हरियाणा क्रिकेट से जुड़ने का ऑफर मिला था और उन्होंने हरियाणा टीम के साथ जुड़ने की प्रक्रिया भी लगभग पूरी कर ली थी। इस बात की जानकारी मिलने के बाद जेटली ने खुद सहवाग को दिल्ली की तरफ से खेलते रहने के लिए मनाया था। जेटली का अंदाज ही कुछ ऐसा था कि सहवाग उन्हें ना नहीं कर पाए थे।

आशीष नेहरा और ईशांत शर्मा जैसे शानदार गेंदबाज भी अरुण जेटली के डीडीसीए अध्यक्ष रहते ही उभरकर विश्व क्रिकेट में पहचान बनाने में कामयाब हुए। इन सभी को भारतीय टीम तक का सफर तय करने में जेटली का खासा योगदान रहा। किसी भी खिलाड़ी की मदद करने में जेटली हमेशा आगे रहते थे। नेहरा अपने करियर के दौरान चोटों से लगातार जूझते रहे। नेहरा जब एक बार टीम इंडिया में खेलते हुए चोटिल हुए थे, तब उनके ऑपरेशन का जिम्मा जेटली ने ही लिया था।

जब बीसीसीआई की तरफ से भारत के लिए खेल चुके पूर्व क्रिकेटरों को पेंशन दिए जाने की योजना शुरू की गई, तब जेटली ने इसे डीडीसीए में भी लागू करने का फैसला लिया। दिल्ली की क्रिकेट में जेटली के योगदान को देखते हुए ही डीडीसीए ने फिरोजशाह कोटला स्टेडियम का नाम उनके नाम पर रखने का फैसला किया है। इस स्टेडियम को अब अरुण जेटली स्टेडियम के नाम से जाना जाएगा।

जेटली राजनीति में सक्रिय रहते हुए भी क्रिकेट से हमेशा ही जुड़े रहे। उन्होंने 2014 में इस्तीफा देने से पहले बीसीसीआई के उपाध्यक्ष के रूप में भी काम किया है। उन्होंने 2013 के आईपीएल स्पॉट फिक्सिंग प्रकरण के बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।

जेटली डीडीसीए के सबसे लंबे समय तक रहे अध्यक्षों में से एक थे। वे करीब 14 साल तक डीडीसीए में प्रमुख रूप से सक्रिय रहे। उनके कार्यकाल में दिल्ली क्रिकेट को कई सुविधाएं मिलीं। उन्होंने फिरोजशाह कोटला को नया रूप दिलावाने में अहम भूमिका निभाई थी। जेटली के क्रिकेट में डीडीसीए को लेकर भ्रष्टाचार के कई आरोप भी लगे, जिसके चलते उन्हें औपचारिक रूप से डीसीसीए से इस्तीफा भी देना पड़ा। उन पर यह आरोप भी लगा कि उनके रहते डीडीसीए में भ्रष्टाचार खूब फला-फूला, लेकिन तमाम आरोपों के बावजूद उनका डीडीसीए में रुतबा और सम्मान कम नहीं हुआ और ना ही उन पर लगा कोई आरोप सिद्ध हो सका।

बीसीसीआई के कार्यवाहक अध्यक्ष सीके खन्ना अरुण जेटली के निधन से बहुत आहत हुए। उन्होंने बताया कि जेटली एक बेहद विनम्र और आत्मबल के धनी इंसान थे, जो अपनी मेहनत से नयी ऊंचाइयों पर पहुंचे थे। उनका जेटली से जुड़ाव श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के दिनों से था और दोनों ने साथ काम किया था। कॉलेज यूनियन में जेटली अध्यक्ष और खन्ना महासचिव थे। श्री खन्ना ने बताया कि उन्होंने जेटली के साथ डीडीसीए और बीसीसीआई में क्रिकेट प्रशासन में भी काम किया। खन्ना मानते हैं कि क्रिकेट में जेटली का योगदान हमेशा याद रखा जाएगा और उन्होंने तो व्यक्तिगत रूप से अपना एक प्रिय मित्र खो दिया है।

अरुण जेटली उन कुछ व्यक्तियों में से एक थे, जिन्हें वास्तव में भारतीय क्रिकेट से प्यार था। वे ऐसे व्यक्ति थे, जो मुश्किलों में बीसीसीआई की मदद के लिए हमेशा आगे रहते थे। नामी वकील होने की वजह से वे विपरीत परिस्थितियों में बीसीसीआई का मार्गदर्शन भी किया करते थे। बल्कि अगर वे सहमत हो जाते तो कई मौकों पर बीसीसीआई अध्यक्ष पद के लिए भी स्पष्ट और सर्वसम्मत पसंद थे। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे।

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